गोवर्धन पूजा और अन्नकूट: पर्वत उठाने की कथा
दीपावली के अगले दिन अन्नकूट क्यों होता है, गोवर्धन परिक्रमा क्या है, और घर पर कैसे मनाएँ।
अपडेट: 25 Oct 2026
कथा ऐसी है: ब्रज के लोग हर साल इंद्र की पूजा करते थे। कृष्ण ने कहा कि गोवर्धन पर्वत की पूजा करना बेहतर है, क्योंकि उसकी चरागाहें हमारी गायों को और उसकी धरती हमें खिलाती है। इंद्र क्रोधित हुए और भयंकर वर्षा भेजी। तब कृष्ण ने अपनी छोटी उँगली पर गोवर्धन उठा लिया और सारे ब्रजवासी गायों-बछड़ों समेत उसके नीचे आ गए।
उसी की स्मृति में दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा होती है। कई मंदिरों में इस दिन अन्नकूट सजता है, यानी ठाकुर जी के सामने दाल, चावल, सब्ज़ी, रोटी और मिठाई जैसे अनेक पकवान पर्वत की तरह रखे जाते हैं। बाद में उसे प्रसाद के रूप में बाँटा जाता है।
गोवर्धन परिक्रमा
गोवर्धन पर्वत वृंदावन से लगभग 20-25 किलोमीटर दूर है। पर्वत के चारों ओर परिक्रमा का मार्ग आमतौर पर लगभग 21 किलोमीटर बताया जाता है। कुछ लोग पैदल करते हैं, कुछ वाहन से। इसे पुण्य का काम माना जाता है, पर दूरी अपनी सेहत के हिसाब से तय करें।
घर पर
छोटे रूप में मनाएँ: मिट्टी या गोबर का छोटा पर्वत बनाकर उस पर फूल रखें, घर में जो भोजन बना है उसमें से थोड़ा ठाकुर जी को चढ़ाएँ और सब साथ बैठकर खाएँ।